
आमतौर पर जब सिलिकॉन वैली किसी जटिल तकनीकी समस्या में उलझती है, तो वह ज्यादा इंजीनियरों और प्रोग्रामरों को काम पर रखती है, जिनमें बड़ी संख्या भारतीयों की होती है। लेकिन प्रमुख एआई कंपनी एंथ्रोपिक ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कुछ अलग रास्ता चुना।
कंपनी ने इस गंभीर सवाल पर विचार करने के लिए धार्मिक विद्वानों, दार्शनिकों और धर्मशास्त्रियों का एक विशेष सम्मेलन बुलाया कि वे असल में क्या बना रहे हैं और उसकी नैतिक सीमाएं क्या होनी चाहिए। इस मंथन में भारत के एक प्रमुख संन्यासी को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।
स्वामी सर्वप्रियानंद बने सैन फ्रांसिस्को में एआई मंथन का हिस्सा
सैन फ्रांसिस्को स्थित एंथ्रोपिक के मुख्यालय में आयोजित इस विशेष विचार-गोष्ठी में वेदांत सोसाइटी ऑफ न्यूयॉर्क के प्रमुख और अद्वैत वेदांत के जाने-माने विद्वान स्वामी सर्वप्रियानंद शामिल हुए।
स्वामी जी ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से पुष्टि की कि कंपनी ने अपने प्रमुख एआई मॉडल ‘क्लॉड’ के ट्रेनिंग और एआई नैतिकता से जुड़ी चर्चा के लिए कैलिफोर्निया बुलाया था।
एक सार्वजनिक व्याख्यान में उन्होंने बताया कि गोपनीयता समझौता की वजह से अंदरूनी ब्योरा साझा नहीं कर सकते, लेकिन कंपनी ने माइथोस और प्रोजेक्ट ग्लासविंग जैसे अपने नवीनतम कार्यों की झलक दिखाई थी।
इस दौरान एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक क्रिस्टोफर ओलाह ने प्रतिभागियों के साथ इस संभावना पर चर्चा की कि क्या एआई मॉडल इंसानी भावनाओं और व्यक्तित्व जैसा व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं।
कौन है स्वामी सर्वप्रियानंद?
स्वामी सर्वप्रियानंद इस चर्चा के लिए सबसे उपयुक्त विचारकों में से एक हैं क्योंकि उनकी विशेषज्ञता अद्वैत वेदांत में है, जहां कॉन्शियसनेस का मिलन आधुनिक न्यूरोसाइंस, भौतिकी और एआई से होता है।
रामकृष्ण मिशन से जुड़े स्वामी जी ने भुवनेश्वर के जेवियर इंस्टीट्यूट से एमबीए करने के बाद 1994 में संन्यास मार्ग अपनाया और 2004 में पूर्ण संन्यास लिया। भारत और अमेरिका के विभिन्न संस्थानों में सेवा देने के बाद वे 2017 में वेदांत सोसाइटी ऑफ न्यूयॉर्क के प्रमुख बने।
इसके अलावा वे हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल में फेलो भी रह चुके हैं और मांडूक्य उपनिषद पर व्याख्यानों को इंटरनेट पर लाखों लोग सुनते हैं।
15 से अधिक धर्मों और संस्कृतियों के विचारों को समेटने की कोशिश
एंथ्रोपिक ने खुद इस कार्यक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि उसने हिंदू, बौद्ध, सिख, इस्लाम, ईसाई और यहूदी सहित 15 से अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विद्वानों और नीतिशास्त्रियों के साथ कई महीनों तक विमर्श किया है।
कंपनी का उद्देश्य किसी एक धर्म को अपनाना नहीं, बल्कि उन सभी सदियों पुरानी परंपराओं से सद्गुण, चरित्र, नैतिक जिम्मेदारी और अच्छे जीवन के मूल्यों को सीखना है। इन विचारों का उपयोग क्लॉड के आंतरिक संविधान, उसके प्रशिक्षण मूल्यों और सुरक्षा मानकों को तय करने में किया जाएगा।
क्या एआई में चेतना संभव है?
स्वामी सर्वप्रियानंद के अनुसार, एंथ्रोपिक के शोधकर्ता एआई की भविष्य की दिशा को लेकर जितने उत्साहित हैं, उतने ही चिंतित भी दिखे। न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ता विचारकों से गंभीरता से सोचने को कह रहे हैं कि क्या उन्नत एआई के पास किसी प्रकार की चेतना या नैतिक अधिकार हो सकते हैं।
बैठक में शामिल पूर्व कंप्यूटर इंजीनियर और रब्बी अब्राहम नावोन को लगा कि शोधकर्ता क्लॉड को महज एक सॉफ्टवेयर कोड की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी संभावित चेतन इकाई के रूप में देख रहे हैं जो नैतिक सम्मान की हकदार है।
हालांकि, स्वामी सर्वप्रियानंद ने हमेशा इंटेलिजेंस और कॉन्शियसनेस के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार वेदांत में मन और बुद्धि भौतिक व वस्तुनिष्ठ चीजें हैं, इसलिए एआई इंसानी बुद्धिमत्ता की नकल तो कर सकता है, लेकिन क्या कोई कंप्यूटेशनल मशीन वास्तव में शुद्ध चेतना का अनुभव कर सकती है या यह सिर्फ जागरूक होने का दिखावा भर है, यह एक बड़ा बुनियादी सवाल है।
हजारों वर्षों के मानवीय चिंतन को मशीन में ढालने की चुनौती
एंथ्रोपिक इस समय एक अभूतपूर्व प्रयोग कर रही है, जिसके तहत मनुष्यता के हजारों वर्षों के चिंतन, करुणा, कर्तव्य और नैतिक बोध को एक ऐसी गैर-मानवीय मशीन में समाहित करने की कोशिश हो रही है जिसे पूरी तरह से खुद इंसान भी नहीं समझ पाया है।
नैतिक आचरण से जुड़ी इसी चर्चा से प्रेरित होकर कंपनी ने क्लॉड को एक ऐसा टूल भी दिया है जो किसी बड़े और संवेदनशील फैसले से पहले उसे उसकी नैतिक जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। आंतरिक परीक्षणों में पाया गया है कि इस तरीके से एआई के अनुचित और भटके हुए व्यवहार में काफी कमी आई है।



