“मेरा मन परिंदा”

डॉ विदुषी सिंह
गोमती नगर, लखनऊ

असीमित आकाश में, अनगिनत आकांक्षाएं, लिए उड़ता है, मेरा यह मन परिंदा।

मां की आंख का देखा हर सुनहरा सपना पूरा हो बस,
इसीलिए रोज मेहनत कर उड़ान भरता है ,मेरा यह मन परिंदा।

वह एक छोटी बहन जो मुझमें साहस ढूंढती है अपना,
उसको सुरक्षित , ऊंची उड़ान देने के लिए ,जीवन की जद्दोजहद से लड़ता है,मेरा यह मन परिंदा।

कुछ ख्वाहिशें अपनी,अपनों की उम्मीदें ,कुछ दोस्तों से किए निश्चल वादे,कुछ किस्मत से ठगे जिद्दी इरादे,
बस इनके लिए ही हरपल हर कठिनाई को परास्त करता है ,मेरा यह मन परिंदा।

इस उम्मीद से कि,शायद एक दिन यह आसमान भी मुझे अपना ले,
अपने सर आंखों पर बैठा ले,
अपनी सितारों भरी रातों ,में मुझे भी एक तारा बना ले,
रोज़ अपने सपनो की उड़ान भरता है ,मेरा यह मन परिंदा।।

 

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