14 साल तक के बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों का पंजीकरण अनिवार्य करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई है जिसमें मांग की गई है कि 14 साल तक के बच्चों को पंथ निरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए। कोर्ट से इस संबंध में केंद्र और सभी राज्यों को जरूरी उचित कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की गई है। इस जनहित याचिका पर कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा।

याचिका में केंद्र सरकार के साथ सभी राज्यों को पक्षकार बनाया गया है। दाखिल याचिका में मांग की गई है कि केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे अनुच्छेद 21ए (छह से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अधिकार) , अनुच्छेद 39 (एफ), अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 51-ए (क), की भावना के अनुसार 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी स्कूलों, संस्थानों को पंजीकृत करने के लिए उचित कदम उठाएं।

मालूम हो कि अनुच्छेद 39 (एफ) कहता है कि राज्य सुनिश्चित करें कि बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र और गरिमामय परिस्थितियों में विकसित होने का अवसर और सुविधाएं दी जाएं। साथ ही यह बचपन और युवावस्था को शोषण और नैतिक व भौतिक खतरों से बचाने की बात करता है। अनुच्छेद 45 राज्य पर छह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए शुरुआती बचपन की देखभाल और शिक्षा देने की कोशिश करने की जिम्मेदारी डालता है।

भाजपा नेता वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय की इस याचिका में दूसरी मांग है कि कोर्ट निर्देश दे और घोषित करे कि अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनके प्रशासन का अधिकार) , अनुच्छेद 19(1)(जी) (रोजगार और व्यवसाय की आजादी) का विशिष्ट दोहराव है और यह अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत नागरिकों को मिले अधिकार के अलावा कोई अतिरिक्त लाभ या विशेषाधिकार प्रदान नहीं करता।

तीसरी यदि कोई किसी धर्म को बढ़ावा देने या प्रचारित करने के लिए धार्मिक शिक्षा देता है वह अनुच्छेद 26 (ए) (धार्मिक समुदाय को धार्मिक और चैरिटेबल कामों के लिए संस्थान बनाने और चलाने का अधिकार) के तहत आता है न कि अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत।

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