
कई नौकरीपेशा लोगों के लिए अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर दूसरा काम पकड़ना आसान नहीं होता है लेकिन कुछ लोग होते हैं जो कठोर फैसला लेते हैं और जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीते हैं। ऐसी ही एक महिला बेंगलुरु में है जिसने आईटी की नौकरी छोड़कर ऑटो चलाने का फैसला किया।
इस महिला ने नाइट शिफ्ट और पारिवारिक दबाव की वजह से ये कदम उठाया। उनका कहना है कि अब उन्हें ज्यादा सुकून भी मिल रहा है और अच्छे खासे पैसे भी कमा लेती हैं।
पिता की मौत के बाद बढ़ी जिम्मेदारी
महिला ने बताया कि उनकी आईटी की नौकरी में नाइट शिफ्ट ज्यादा होने लगी थीं। पिता की मौत के बाद वह अपनी मां के साथ रह रही थीं और उन्हें रात में मां को अकेला छोड़ने का विचार परेशान करता था। उन्होंने बताया कि वह आईटी में ही काम करना पसंद करतीं लेकिन बदलते शेड्यूल की वजह से घर की जिम्मेदारियों को संभालना मुश्किल होता जा रहा था।
उनकी शिफ्ट भी तय नहीं थी और हर हफ्ते बदलती रहती थी, जिसकी वजह से एक रुटीन बनाना मुश्किल होता जा रहा था। लगातार शिफ्ट बदलने की वजह से उनका रूटीन पूरी तरह बदल गया था। आने-जाने की वजह से भी मुश्किलें बढ़ जाती थीं।
सेहत बनी चिंता का विषय
उन्होंने कहा कि कभी-कभी कर्मचारियों को उनकी शिफ्ट शुरू होने से एक या दो घंटे पहले ही कंपनी की कैब लेने आ जाती थी, जिसे उन्होंने सिरदर्द बताया। इसलिए उनके लिए सवाल सिर्फ यह नहीं था कि उन्हें अपनी नौकरी पसंद है या नहीं। सवाल यह था कि क्या उस नौकरी के साथ वह अपनी बाकी जिंदगी भी ठीक से संभाल पा रही थीं। उनकी सेहत भी एक चिंता का विषय बन गई थी।
‘मैं रख लूंगी अपना ख्याल’
उन्होंने बताया कि काम के मुश्किल रूटीन की वजह से उन्हें PCOD हो गया, जिससे उन्हें अपने करियर के बारे में फिर से सोचने की एक और वजह मिल गई। आखिरकार, वह ऐसे मोड़ पर पहुंच गईं जहां उन्हें लगा कि हालात को खुद ही संभालना होगा। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता। मैं यह करूंगी और यह मुमकिन है। मैं अपना ध्यान रखूंगी।” इसी सोच ने उन्हें एक अलग करियर की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
ऑटो चलाना शुरू किया
आईटी की नौकरी छोड़ने का मतलब यह बिल्कुल नहीं था कि उन्होंने कोई आसान पेशा चुन लिया। ऑटो चलाने में भी अपनी चुनौतियां हैं। जैसे लंबे समय तक काम करना, ट्रैफिक, सुरक्षा की चिंताएं और अजनबियों से निपटना लेकिन इस महिला को जो फायदा हुआ, वह था अपने शेड्यूल पर अपना कंट्रोल।
उन्होंने बताया कि वह खुद तय कर सकती थीं कि कब काम करना है और सबसे जरूरी बात यह कि जब उनके परिवार को उनकी जरूरत होती तो वह अपना शेड्यूल बदल सकती थीं। उनकी मां और परिवार के दूसरे सदस्यों ने शुरू में सवाल उठाया कि क्या वह ऑटो चला पाएंगी। खासकर इसलिए क्योंकि वह एक महिला थीं लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग रहीं।
यह कदम आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित हुआ। उनका कहना है कि ज्यादा कमाई के साथ-साथ अपने समय पर बेहतर कंट्रोल होने की वजह से यह फैसला और भी सार्थक हो गया। उन्होंने कहा, “पढ़े-लिखे होने का मतलब यह नहीं है कि आपको सिर्फ आईटी में ही काम करना चाहिए।”
ट्रोलिंग का भी करना पड़ा सामना
उन्होंने कहा कि महिला ऑटो ड्राइवरों को कभी-कभी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है और लोग सोच सकते हैं कि वे बस दिखावे के लिए गाड़ी चला रही हैं। उन्होंने इस बात का विरोध किया कि शिक्षा से यह तय होना चाहिए कि किसी महिला को किस तरह का काम करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि महिलाओं का भी परिवार और जिम्मेदारियां हो सकती हैं और शिक्षित होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें सिर्फ आईटी में ही काम करना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि हर कोई उनके साथ बुरा बर्ताव नहीं करता। कुछ यात्री उनका साथ देते हैं और सम्मान के साथ उन्हें मैडम या दीदी कहकर बुलाते हैं।



