
इम्तियाज अली की फिल्मों के किरदार केवल बाहरी सफर ही नहीं करते, बल्कि एक गहरी अंतर्यात्रा से भी गुजरते हैं। वे किसी एक जगह या अवस्था में ठहरने वाले नहीं होते। उनकी यात्रा कहीं से शुरू होकर कहीं और पहुंचती है, और इस दौरान वे स्वयं को नए सिरे से खोजते हैं। कई बार यह सफर उन्हें उनके पुराने ठिकानों तक भी ले जाता है, जहां वे अपने अतीत से रूबरू होते हैं। इस बार उन्होंने विभाजन की पृष्ठभूमि में प्रेम कहानी के साथ विस्थापितों के दर्द को उकेरा है।
वर्तमान और अतीत के बीच की कहानी है ‘मैं वापस आऊंगा’
कहानी ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरूद्दीन शाह) की है। डिमेंशिया (याददाश्त संबंधी बीमारी) से जूझ रहे 95 वर्षीय ईशर के मन में अपने घर, अपने प्रेम और अपनी युवावस्था की स्मृतियां अब भी जीवित हैं। लंदन से आया उनका साफ्टवेयर इंजीनियर पोता निर्वैर ऊर्फ निवी (दिलजीत दोसांझ) उनकी टूटी फूटी भाषा को समझने की कोशिश करता है। अतीत में आती-जाती कहानी से ईशर की जिंदगी के पन्ने खोलती है।
लाहौर में कॉलेज में पढ़ने वाला युवा ईशर यानी कीनू (वेदांग रैना) और जिया (शरवरी) एकदूसरे से बेपाह मुहब्बत करते है। देश विभाजन की खबर से सद्भाव का माहौल बिगड़ने लगता है। जिया को डर सताने लगता है कि कहीं कीनू हिंदुस्तान न चला जाए। वही निवी इंटरनेट मीडिया और कुछ लोगों की मदद से दादा द्वारा बताई गई जगहों के सहारे उनके अतीत की कडि़यां खोजने लगता है।
फिल्म में कई जगहों पर नहीं मिल पाई भावनात्मक गहराई
देश विभाजन इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी थी। जिन लोगों ने विभाजन को अपनी आंखों से देखा और उसकी पीड़ा को झेला, जिन्हें अपना घर, अपनी मिट्टी और अपने प्रियजन छोड़ने पड़ने। वो गहरे जख्म उनके मन में आजीवन बने रहे। ‘मैं वापस आऊंगा’ सिर्फ विभाजन की त्रासदी के साथ उन अनकहे दुखों, बिछड़नों और भावनात्मक कीमतों को समझने का प्रयास है, जिन्हें लोगों ने सरहदें तय हो जाने के बाद भी दशकों तक अपने भीतर संजोए रखा।
इम्तियाज अली और नयनिका मेहतानी की लिखी कहानी कुछ जगहों पर अपनी पकड़ ढीली करती है। फिल्म का फर्स्ट हाफ धीमी गति से आगे बढ़ता है। विभाजन की त्रासदी बहुत मार्मिक नहीं बन पाई है। विभाजन के कारण कीनू और जिया के बिछड़ने की त्रासदी को अपेक्षित भावनात्मक गहराई नहीं मिल पाई है, जबकि 78 साल लंबे इस प्रेम-प्रसंग का भावनात्मक प्रभाव काफी हद तक उसी पीड़ा पर टिका हुआ है।
शर्मिला और मासूम कीनू विभाजन के बाद कितना बदलता है उसकी झलक भी इम्तियाज देते हैं। ईशर के दादा का दर्द भी दिखाते हैं जो अपने घर की औरतों को वहीं छोड़ आए होते हैं। उनके परिवार की महिलाओं के साथ हुई बर्बरता के दृश्य दहलाते हैं। फिल्म के संवाद भी कई जगह मारक हैं।
फिल्म के आखिर में कथन लिखकर आता है कि अगर मुझे घर छोड़ने और मौत में किसी एक चुनना हो मैं मौत चुनूगा। यह बताता है कि हर इंसान के लिए उसका घर कितना अहम होता है। अंत में अलग-अलग देशों के लोगों के विस्थापन के दर्द को दिखाया है कि आज भी दुनिया भर में लोग युद्ध, राजनीति, आर्थिक या अन्य परिस्थितियों के कारण अपने घरों से दूर शरणार्थी कैंप में रहने को मजबूर हैं।
नसीरुद्दीन शाह की सबसे बेहतरीन फिल्म है
फिल्म का सबसे खास आकर्षण है नसीरूद्दीन शाह का अभिनय। यह फिल्म उनके करियर की सबसे शानदार फिल्मों में शामिल होगी। उन्होंने ईशर की नाजुक अवस्था के बीच उनके अंदरुनी दर्द, अपनी प्रेमिका से मिलने की तड़प और विभाजन के असर को बखूबी बयां किया है। निर्वैर की भूमिका में दिलजीत दोसांझ का अभिनय उल्लेखनीय है। वह बीच-बीच हल्के फुल्के पल लेकर आते हैं।
स्टैंडअप कामेडी के दौरान अंग्रेजों के फैसलों पर व्यंग्य, अपने प्रेम संबंधों को स्वीकारने को लेकर उसका असमंजस लेकर दादा की बातों को समझने के तरीकों को बखूबी जीते हैं। युवा ईशर की भूमिका में वेदांग रैना प्रभाव छोड़ते हैं। शरवरी ने जिया की मासूमियत और अल्हड़पन को पूरी तरह से आत्मीयता से जिया है। सहयोगी भूमिका में रजत कपूर, विनोद नागपाल, मनीष चौधरी भी अपना पूरा योगदान देते हैं।
स्क्रिप्ट और दृश्यों को बारीकियों से समझा गया
फिल्म के विजुअल्स शानदार है। सिनेमेटोग्राफर सिल्वेस्टर फान्सेका ने वर्तमान से अतीत में आती-जाती कहानी को बखूबी कैमरे में कैद किया है। इरशाद कामिल के लिखे गीत को संगीतकार ए आर रहमान ने अपनी धुनों से संवारा है। इनमें मस्कारा और क्या कमाल है कर्णप्रिय हैं। फिल्म का संपादन खासतौर पर सराहनीय है। आरती बजाज ने स्क्रिप्ट और दृश्य की बारीकियों को समझते हुए उन्हें अच्छी तरह जोड़ा है।
कुलमिलाकर विभाजन के जख्मों, अधूरे प्रेम और अपने घर की यादों को समेटे यह फिल्म भावनाओं से भरी एक धीमी, लेकिन भावनात्मक कहानी है। इसकी कमियां दिखती हैं, मगर इसका दिल सही जगह पर है।
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